सोमवार, 7 दिसंबर 2015

समय रूकने के प्रमाण एवं चमत्कार ।

🚁 ⛅ 🚠 पोराणिक कथाओं मे एसे और भी प्रमाण मिलते है । जो सच है या झूठ यह तो हम नही कह सकते पर हम  अपने अनुसार समय की व्याख्या जरूर कर सकते है । जो हमे आभास होता है । जैसे  समय हम सभी इंसानों के कभी कभी अचरज मय  और चमत्कारी सा लगता है । जैसे कि सयम का हर छण नबीन होना ' कभी कभार समय का एक सेकिंड सदियों सा लगता है ' और कभी एक साल भी एक दिन के बराबर लगता है ।  इस पूरे वृहमाण्ड मे मनुष्य ही एक  एसा प्राणी है जो समय से पीडित है । बाकी सभी जीवो के लिए समय का कोई महत्व नही है ।
समय की हकीकत तो यह है '  समय' शब्द के अर्थ  से  उजागर हो रही है ' जैसे _ सम+ य = समय ा  याने कि समय  सम है ' स्थर है । न कही जाता है और न कही से आता है । स्थर रहते हुए ही इलेक्ट्रॉन की तरह गोल घुमता हुआ गतिशील पृतीत होता है ।
ओशो के अनुसार _ मनुष्य के जन्म मृत्यु के पार समय मापन का कोई उपाय नही होता है । समय स्केल आदमी के जन्म के साथ शुरू होता है एवं मृत्यु के साथ समाप्त । फिर भी  आसली समय हमेशा रहता है ।
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शुक्रवार, 4 दिसंबर 2015

दुकानों की बिक्री बढाने के तरीके ।

color">दुकानों की बिक्री बढाने के उपाय और भारी लाभ कमाए ।
सॉपिंग सेंटर के काउंटर पर सुंदर महिलाऔ को बैठी देखकर ' सॉपिंग करने ग्राहक अधिक आते है ।

सॉपिंग सर्बिस सेंटरो या दुकानों किसी भी सेबा व्वसाय को चलाने के लिए उस पर ग्राहको का आना बहुत जरूरी है । बाजार का हर दुकानदार यही चाहत है कि उसके सॉप पर अधिक से अधिक ग्राहक आए और उसकी सेबा या बस्तुए खरीदें ' जिससे वह अधिक लाभ कमाए । इस उद्देश्य को लेकर दुकानदार अपनी तरफ से हर वह तरीका अपनाते है ' जिससे उनकी ग्राहकी बढे और जादा माल बिके । बाजारों मे दुकाने दुल्हन की तरह सजी 'रंगीन लाइट मे झिलमिलाती रहती है । दूकानदार ग्राहको को आकृशित करने के बिभिन्न उपाय करते है । जैसे_ ग्राहको को बैठने की उत्तम गद्देदार व्यवस्था करना ' तो कोई अपने सॉप पर आने वाले हर ग्राहक को चाय पिलाता है ' कुछ कपडे आदि की दुकानों पर सामान के साथ कपडे के थेले मुफ्त मे दिये जाते है । पर इन उपायों से ग्राहको पर कोई बिशेष प्रभाव नही पडता इन उपायो को आम बात समझा जाता है । दुकानों पर ग्राहकों की संख्या मे बढोत्री करने के लिए कुछ खास उपायों करने की जरूरत होती है । जो नीचे दिए जा रहे है । ∆ दुकान पर ग्राहक की जरूरत का सभ सामान उपलब्ध होना चाहिए । ग्राहक खली निराश होकर नही लोटना चहिए । वरना वह फिर वह कभी दुकान पर नही आता है । ∆सेबा प्रदाताओ को ग्राहको के सुझावों के अनुसार अपनी सेबा को बेहतर बनाना चाहिए । ∆ ग्राहक लाने के लिए दुकानदार को कमीशन पर एजेंट रखना चाहिए । जिस तरह दिल्ली मुम्बई के बाजारों मे एजेंटों को ग्राहक लाने पर कमीशन दिया जाता है । ∆ अपने सॉपिंग सेंटर या सेबा संस्थान के मेन काउंटर पर सुन्दर महिलाओं को बिठाया जाना चाहिए । यह ग्राहको को लुभाने का बहुत ही कारगर उपाय है । ∆अपनी दुकान पर आने वाले हर ग्राहक से मधुर व्वहार करने के साथ ही उससे विनम्रता पूर्वक कहना चाहिए कि अगर आपको हमारी सेबा एवं हमारा व्वहार अच्छा लगा हो तो कृपया दो और लोगों से हमारे बारे मे जरूर कहना । ग्राहक बढाने का यह एक राम बॉण उपाय है । ∆दुकान के बाहर मनमोहक सुगंध फेलाना चाहिए । सुगंध के प्रभाव से देवत भी वशीभूत हो जाते है । फिर तो ग्राहक मनुष्य होता है वह इससे कैसे वच सकता है ।

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गुरुवार, 3 दिसंबर 2015

खेतों मे प्लास्टिक कचरे का खतरा ।

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खेतों की मिट्टी मे प्लास्टिक पोलेथिन(पन्नी) से होने वाले नुक्सान का खतरा दिन प्रति बढता ही जा रहा है। खासकर गॉव शहरो के आसपास की जमीनों पर यह प्लास्टिक कच्डा बहुत तेजी से जमा हो रहा है । समय रहते इस कच्डे से जमीनों को बचाने के उपाय नही किए गए तो आने बाले समय मे आबादी के पास वाले खेतो मे फसलें उगाना असंभव हो जाएगा ।  क्योकि यह प्लास्टिक मिट्टी मे दबने पर बहुत सालो तक नष्ट नही होता  एवं पानी को मिट्टी मे रिसने से र रोकता है और जहाँ जहाँ मिट्टी मे प्लास्टिक पोलेथिने होती है ' वहाँ फसलो के पौधे अपनी जडे जमीन मे न जमा पाने के कारण सूख जाते है ।
अपने खेतो को प्लास्टिक कचडे से बचाने हेतु ' किसानों को निम्न  उपाय करना चाहिए । जैसे _
[1]  खेतों की सतह पर पाई जाने वाली पोलेथिन पन्नियो को  एक  एक करके बिनवाने के बाद संग्रह करके जला दे ' प्लास्टिक को जलाने पर भी इससे जहरीली गैसे निकलती है । पर  इसके अलावा  और कोई उपाय भी तो नही है ।
प्लास्टिक कच्डे का निपटारा करने के बाद ही किसानो को अपना खेत बखरना चाहिए जिससे प्लास्टिक जमीन मे ना दब पाए ।
[2]   खेतो मे खाद बीज कीटनाशक आदि का उपयोग करने के बाद  इनके खाली पेकिट खेत मे इधर  उधर नही छोडे । बल्कि इनहे एक जगह  इकटठा करके नष्ट करना चाहिए ।
[3]  खेतो मे प्लास्टिक कच्डा फेकने बालो पर नजर रखने के साथ ही उन पर प्रतिबंध लगाना चाहिए ।

[4]  खेतों मे प्लास्टिक बोरियो का उपयोग पानी रोकने के लिए होता है ' एवं टेरीकाट कपडे का उपयोग कागभगोडा बनाने के लिए किया जाता है । उपयोग के बाद  इनका निपटारा करना चाहिए । टेरीकॉट कपडे और प्लास्टिक बोरियॉ तो जमीन मे दबने पर दो चार फिट जमीन को खराब करते है ।

[5] अक्सर गॉवो मे यह पाया जाता है कि किसानों के घर की महिलाएँ ' पशू  मबेशियो की  सार बखरी का  गोवर  जिस कूडे के ढेर पर फेकती है ' वे उसी ढेर पर  अपने घर का कच्डा भी फेकती है जिसमे लगभग 50% प्लास्टिक कच्डा होता है । और फिर किसान इस कूडे के ढेर को अपने ट्रेकटर ट्राली मे भरकर खेतो मे डालते है । जिससे बहुत मात्रा मे प्लास्टिक खेतो मे पहुँचता है ।  जो खाद के रूप मे फायदा कम ' प्लास्टिक के कारण नुकसान जादा होता है ।
जबकि किसानों को एसा करना चाहिए कि  घर  का कूडा अलग फिकवाए । एवं  मवेशियो से पैदा होने बाला  गोवर घॉस भूसे का कच्डा  अलग ढेर पर डलवाए ' जिसका उपयोग खेतो मे खाद के रूप मे करें ।
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खेतों में प्लास्टिक कण्डे के खतरे से सावधान ।

शनिवार, 28 नवंबर 2015

ग्रामीण खेती मजदूरो की दशा।


कृषी प्रधान देश भारत मे किसान को ही अन्नदाता माना जाता है । एवं श्रम का सारा श्रेय किसान को ही दिया जाता है । जवकि आज वह जमाने नही रहे तव किसान खुद  अपने खेतो मे हल चलाते थे । कवि उन पर लिखते थे कि _ सूरज के उगने से पहले खाट छोड  उठ गया किसान ' और चला खेत पर करने काम - - -  ।
आज तो कृषी कार्य मशीन यंत्रों से होता है । बाकी का सारा कृषी काम मजदूर करते है । किसान तो जमीन का मालिक होता है और प्रबंधन करता है । जबकि खेती मजदूर ठंड ' गरमी ' धूप ' बरसात  मे भी खेतो मे काम करते है । रात मे भी खेतो की रखवाली वा पानी सिचाई जेसे काम भी करते है । खेतो मे जहरीली दवाओं का छिडकाव  और धान की फसल मे सुगंध के कारण सॉपो के होने पर भी यह मजदूर  अपनी जान की परवाह किए बिना खेतो मे खतरा होने पर भी काम करते है । क्योकि इनहे अपना परिवार  चलाना होता है । पर  इन पर किसी की नजर नही जाती  न कवि  न पत्रकार न सरकार  कोई इनहे नही देखते ' सिवाय  एक चमगीदण के जो इनके अंधेरे झोपडो मे भी देख लेता है ।

मध्य भारत के गॉवो मे रहने वाले भूमी हीन लोगो के पास  आय का साधन न होने के कारण यह लोग खेती मजदूरी पर ही   निर्भर रहते है । पर हर बडा जानवर छोट को खाता है ' इस नियम के तहत किसान  इन मजदूरो का शोषण करके अपना धर्म निभाते है । बर्तमान समय मे गॉवो मे कृषी कामगारो से दिन मे 10 घंटे काम लिया जाता है । और  एक दिन की मजदूरी का रेट 150 रू से200 तक देय है । भुगतान  अनाज बिकने पर किया जाता है '  एवं जव  अनाज का अच्छा भाव होता है तब  अनाज बैचा जाता है । और फिर मजदूरो का भुगतान होता है ।
एसी स्थति मे बेचारा  कृषी मजदूर कैसे जीता होगा । सरकार के पास  इसका जवाव है ' नरेगा '  पर नरेगा मॉ  टी वी और कगजो मे ही दिखती है । नरेगा का सारा काम मशीनो से होता है । बैक से पैसा किराए के मजदूरो दुवारा निकलवा लिया जाता है ।
अब ग्रामीण मजदूर के पास  एक ही रास्ता होता है की वह शहर मे जाकर काम करे ' पर इनमे से कुछ लोग  अपनी जन्म भूमी नही छोडना चाहते । अब  इनके पास  आखरी बिकल्प होता है कि यह मजदूर बैक से रिण लेकर  अपना स्वरोजगार करे । पर  इस  अस्त्र का प्रयोग  इनके बापो ने पहले ही कर लिया ' और  अभी चुकाया नही गया ' इस कारण बैक रिण नही देता । कृषि कामगारों के लिए विशेष  कर  सरकार की भी कोई एसी योजना नही है जिसके चलते इन कामगारो का विकाश हो सके ' अरे हॉ याद  आया  एक योजना है सरकार की  २ रू किलो अनाज मिलने बाली योजना ' जिसके सहारे यह लोग जीवित रह सकते है । क्योकि अगर यह लोग नही रहेगे तो कृषि काम के अलावा भवन पुल बॉध बनाने का काम कोन करेग ।  फिर तो ईट मिट्टी गारे का काम भी इंजीनियर  को ही करना पडेगा । पर  एसी नोवत नही आएगी क्योकि  इन मजदूरो के बच्चे है ना जो  भविश्य मे मजदूरी करने के लिए तैयार हो रहै है ' सरकारी स्कूलो मे पढ कर  ' गॉव के सरकारी स्कूलो मे मजदूरो के ही बच्चे जादा पढते है । वहॉ इन बच्चो को ज्ञान के नाम पर मध्यान भोजन के रूप मे अल्प  अहार ही मिलता है ।
इन गॉव के गरीब लोगो के बारे  मे जानकारी मिलती है कि  इनमे से अधिकाश  के बाप दादा परदादा भी हलवाहे या खेतीहल मजदूर का ही काम करते थे । और  अब  इनके बच्चे भी आगे मजदूरी ही करेगे । इनकी किसमत मे मजदूरी करना ही लिखा है । यह  इनका दुरभाग्य है ।
चमगीदण की नजर मे इनका आर्थिक विकास असंभव ही नही नामुमकिन है ।

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शुक्रवार, 27 नवंबर 2015

सन कंट्रोल फिल्म 'कम लागत का व्यवसाय ।

सन कंट्रोल फिल्म _ यह कॉच पर चिपकाने वाली एक पोलेथिन होती है ।जो पोलिएस्टर फिल्म के नाम से भी जानी जाती है ।जिसका उपयोग शीशे पर  इंसुलेशन करने के लिए किया जाता है । इस पोलेथिन को कॉच पर चिपकाने से सूरज की धूप से बचाव  के अलावा और भी फाएदे होते है ।जैसे शीशा रंगीन दिखना ' एवं फिल्म लगे कॉच से गाडी के अंदर से बाहर तो देखा जा सकता है पर बाहर से भीतर नही देखा जा सकता है ' फिल्म बाले कॉच का टूटने का चान्स भी कम रहता है ।टी . वी. लेपटॉप 'कंप्यूटर  आदि की स्क्रीनो पर फिल्म चढाने से अॉखे खराब होने से बचती है । इस फिल्म का सबसे अधिक  उपयोग बस 'ट्रक' जीप 'कार  आदि मोटर बहनो की बिन्डो स्क्रीनो पर किया जाता है ।शीशे पर यह फिल्म लगाने के बाद यह 3से5साल तक चलती है ।

सन कंट्रोल फिल्म लगाने का काम वेरोजगार युवाऔ के लिए रोजगार का एक  अच्छा बिकल्प हो सकता है । इसे बिलकुल कम लागत मेहनत से शुरू किया जा सकता है । इस काम के लिए विशेष स्थान की भी आवश्यकता नही पडती युवा चाहे तो वह ग्राहको के पास जाकर भी यह काम कर सकता है ।और चाहे तो पार्ट टाइम या फुल टाइम भी कर सकता है । किसी दूशरे काम के साथ भी इस काम को किया जा सकता है जैसे पेंटिंग 'आदि ।
शहरो के अलावा स्टेट हाइवे या नेशनल हाइवे रोडो के किनारे पर  इस सेवा इकाई को स्थापित करना अधिक फायदेमंद हो सकता है । क्योकि मोटर गडियो के शीशो पर फिल्म लगाने का काम एसे स्थानो पर  अधिक मिल सकता है ।जिससे अच्छा लाभ कमाया जा साकता है।
पोलिएस्टर पोलेथिन खरीदने के लिए शहरो के बाजारो मे पोलेथिन की थोक दुकानो पर संपकृ किया जा सकता है । जहॉ यह फिल्म बहुत ही सस्ते रेट पर मिलती है लगभग 10 रू वर्गफिट के हिसाव से मिलती है ।

इस फिल्म को कॉच पर लगाने का काम दो तीन दिन की ट्रेनिंग से सीख सकता है ।अपने घर पर कॉच पर फिल्म लगाने का अभ्यास करने से ' जिसमे कुछ फिल्म तो बेकार जाएगा । पर फटाफट काम करने का तरीका मिल जाएगा । जिससे गाडीऔ बाले ग्राहको को काम कराने के लिए देर तक  इंतजार नही करना पडता ।
यह काम करने का बिलकुल सरल तरीका है । सबसे पहले स्प्रे से कॉच को धोया जाता है इसके बाद साफ कपडे से पोछा जाता है ' कॉच सूखने के बाद  इसके आकार की फिल्म काटकर साबधानी से कॉच पर चढा दी जाती । बस  इतनी सी कारीगरी है इस काम मे और  इसी के पैसे देता है ग्राहक ।
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रविवार, 22 नवंबर 2015

हर समस्या से लाभ उठाने का राज़ ।

थिंक एन्ड ग्रो रिच ' किताब के लेखक नेपोलियन हिल के अनुशार _ हर  समस्या अपने साथ  अपने बराबर या अपने से भी बडा अवशर साथ लाती है ।
लेखक की यह खोज मनुष्य के लिए एक बरदान है । यह  एक  एसी राज़ की बात है जिसका लाभ  उठाकर व्यक्ती सफल हो सकता है । व्यक्ति परेशानी के साथ  आने वाले अवसर को पहचानने की कलॉ  सीखकर  अपने ऊपर  आने बाली हर समस्या से लाभ  उठा सकता है । यह जादा कठिन नही है ' समस्या आने पर थोडी सी सूझ बूझ की जरूरत है ' बस । पहले  एक दो बार कठनाई पडती है ' इसके बाद तो चाबी हाथ लग जाती है । और फिर व्यक्ति परेशानी आने पर घबराता नही है । अपितु खुस होता है क्योकि वह परेशानी को नही बल्कि अवसर को देखता है और  उसका लाभ लेता है ।

हर समस्या मे छिपे हुए चॉन्स को खोजने के लिए ' हमे समस्या को बिपरीत  और साकार  आत्मक नजर से देखना होता है । तभी हम  अवसर को जान पाते है वा उसका लाभ  उठा पाते है । एवं  राह मे आने वाली कठिनाईऔ के रोडो को सीडी बनाकर जीवन मे आगे बढ पाते है ।

उदाहरण _ व्यक्ति का बीमार होना उसके लिए एक समस्या है । पर बीमारी के दोरान मिलने वाला ' फुरसत का समय  उसके  लिए एक  अवसर भी है । जिसका लाभ लेने के लिए व्यक्ति  इस समय मे एसे काम कर सकता है ' जिनहे भाग दोड भरे समय मे नही किया जा सकता है ।
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शनिवार, 21 नवंबर 2015

कपडा बेचने की एक सफल स्कीम ।

पिछले दिनो मुझे एक कपडा व्यपारी के बारे मे पता चला है ।  वह  एक स्कीम से कपडे बेचता है और भारी मुनाफा कमाता है ।
उस वयपारी की योजना कुछ  इस प्रकार है _ व्यपारी किसी कंपनी से घटिया किस्म के कपडे थोक मे सस्ते रेट पर खरीद कर लाता है ' जिनमे पेंट सर्ट' सडी ब्लाऊज ' और कुर्ती  सलवार के कपडे होते है ।इन कपडो को वह  अपने यहॉ लाकर  इनके फीस कटवाकर  तीन पृकार की आकृषक पेकिंग मे आलग  अलग मेच के अनुसार सेट तैयार करवाता है । एक सेट पेंट सर्ट के कपडो का दुशरा साडी व्लाउज का और तीसरे सेट मे कुर्ती सलवार के कपडे पेक होते है । यही कपडे परिधानो  मे सबसे अधिक पहने जाते है ।इसके बाद व्यापारी इन कपडो के पेकिंग सेटो के साथ  इनामी कूपन लगवाता है ' जो स्क्रेच करने बाला होता है जिसके उपर मोबाइल  आदि ईनाम छपे होते है । पर हर कूपन मे कपडो का ही एक सेट निकलता है । साडी के सेट के कुपन मे पेंट सर्ट और पेंट सर्ट  के सेट मे साडी व्लाउज य सलवार सूट का सेट निकलता है । यह व्यपारी अपनी बेन मे माल लेकर  अपने आठ दस सेल्स मेनो के साथ कपडे बेचने के लिए मुहल्लो ' कस्वो और गॉवो मे जाता है ।  वहॉ पर  इसके सेल्स मेन  अपने कंधो पर कपडो के सेटो से भरे बेग टाग कर  अलग  अलग गलियो मे जाकर  आवाजे लगाकर कपडे बेचते है ।और हर सेट मे इनाम निकलने की गेरंटी देते है । इनाम के लालच मे आकर वह स्त्रियॉ और पुरूस भी इनके कपडे खरीद लेते है जिनहे कपडो की जरुरत नही थी । और प्राय: 600 रू तो हर  आदमी की   जेव मे पडे ही रहते है {' जितनी इन कपडो की कीमत है }  इन पैसो को यह सेल्स मेन लोगो की जेव से स्कीम के तहत निकाल लेते हे । और जिन लोगो को एक जोड कपडो की भी जरूरत नही होती ' उनहे दो जोड कपडे बेच देते है । तो है न कमाल की स्कीम ।
इस तरह  इस व्यपारी का एक सेल्स मेन दिन मे 15 से 30 तक कपडे के सेट बेच लेता है । हर  एक सेट पर सेल्स मेनो को 50 रू का कमीशन मिलता है । जिससे यह लोग भी खूव कमा लेते है । अगर  एक सेट पर 50 रू कमीशन है तो व्यपारी को भी इतना ही प्राफिट  एक सेट पर जरूर मिलता होगा । इस हिसाव से दस लोग  एक दिन मे लगभग 200 सेट बेचते है जिन पर व्यपारी को 10000 रू का शुध लाभ होता है । और  इस चलती फिरती कपडे की दुकान मे तेजी से माल बिकने के कारण मुदृा भी स्थर नही होती ' एवं उधार  माल का पेमेंट भी जलदी चुकता हो जाता है । इस काम मे जादा झंझट भी नही है । न दुकान का किराया ना बिजली का बिल और न नोकर की सेलरी आदि कोई खर्च नही होत  इस तरह के काम मे । उपर से मुनाफा भी अधिक मिलता है ।
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चूना उघोग, कम लागत, आधिक मुनाफा

  आज भारत मे 75 पैरेंट लोग पान में जो चुना खाते है।  इस चूने को बनाना और इस तरह की डिब्बी में भरकर बेचने वाले लोग भारी मुनाफा कमाई करते है।