मंगलवार, 14 फ़रवरी 2017

सब्जी बीजों से बनते है 'मगज और मेवा ।

कद्दू 'खरबूजा 'तरबूज ' लोकी और खीरा के पके बीजो को हम बेकार समझकर फेक देते है ।जवकी इनही बीजो से कीमती मगज  और मेवे बनते है । इन बीजो के छिल्के को हाथ से छीलकर निकाली जाती है इनकी गिरी जिसे बिजी ' गिरी 'मिंगी ' मेवा और मगज कहते है ।
सब्जियों के बीजो की गिरी का उपयोग ।
इन बीज की गिरी का उपयोग मिठाईयॉ ' हलवा ' खीर  और मगज के लड्डू बनाने मे किया जाता है । जन्म अष्टमी के पर्व पर  इन मेवो का उपयोग मिष्ठानो मे विशेष तोर पर किया जाता है ।ठंडे पेय ठंडाई बनाने मे खीरा ओर चीमडी के बीज की गिरी का उपयोग दिमाग को एनर्जी देने के लिए किया चाता है । उत्तर भारत मे इन मेवो का उपयोग  अधिक होता है । किराना दुकानो पर  इन गिरी मेवो खरीदे बैचे जाते है ।इन मेवो का मुल्य 300₹ से 650 रू तक होता है । घरेलू उपयोग के लिए तो जो महिलाए इन मेवो के बारे मे जानतीं है वह  इन बीजो को हाथ से छीलकर कुछ थोडे से गिरी के मेवे अपने उपयोग के लिए घर पर ही तैयार कर लेती है ।
हाथरस गिरी व्यापार का केंद्र है ।
भारत मे हाथरस गिरी व्यापार का बडा केंद्र है ।यहाँ पर हर दिन 4_5 टन बीजो से गिरी निकाली जाती है ।पहले तो बीजो से गिरी निकालने का काम घरो मे महिलायो से हाथ से बीज छिलवाकर गिरी निकलवाई जाती थी पर  अव यह काम फेक्ट्रीयो मे मशीनो से होता है और केमिकलो से बीजो की गिरी निकाली जाती है ।हाथरस से पूरे भारत के अलावा विदेशो मे भी भारी मात्रा मे गिरी मेवे भेजे जाते है ।

सोमवार, 13 फ़रवरी 2017

हवा मिठाई का विजनस ।

हवा मिठाई का अविष्कार सबसे हले यूरोप मे 19 वी सताब्दी मे हुआ था । इसके बाद यह मिठाई कॉटन कैंडी के नाम से दुनिया मे प्रशिद्ध हुई ।
कॉटन कैंडी _गुडिया के बाल नाम से जानी जाने वाली हय मिठाई बच्चो की पसंदीदा मिठाई है ।
कॉटन कैंडी का विजनस कम मेहनत कम लागत से शुरू किया जाने वाला गृह  उधोग है ।जो अधिक मुनाफा देता है । इस काम को कोई भी साधारण सूझवूझ वाला आदमी मात्र 2000 रू की लागत से आरंभ कर सकता है । जहाँ पर कॉटन कैंडी बनाने का काम होता है वहॉ से तीन दिन की ट्रेनिंग लेकर यह काम सीखा जा सकता है । इसके बाद जरूरत होती है कॉटन कैडी बनाने बाली मशीन की जो बाजार मे 10_15 हजार रूपये की कीमत मे मिलती है ।छोटे स्तर पर काम करने के लिए मिनी कॉटन कैंडी मेकर से भी काम चलाया जा सकता है जो और भी कम कीमत पर मिल जाता है । इसके बाद कच्चे माल के रूप मे - चीनी ' तेल ' खाने के रंग ' स्टिक (काडी) फलो के एसेंस ' प्लास्टिक पीपी (पन्नी ) आदि की जरूरत होती है । इसके बाद तो 200 रू के कच्चे माल से हजार रू का माल तैयार होता है क्योंकि एक किलो चीनी से लगभग 100 कॉटन कैडी के पेकिट तैयार होते है । जो दस रू पेकिट के हिसाव से बिकते है । कॉटन कैंडी बेचने के लिए भी किसी स्टाल या विशेष स्थान की जरूरत नही है । इन पेकिटस को एक डंडे पर लटकाकर फेरी लगाकर बेचा जाता है ।
कॉटन कैंडी मे कुछ नया करने की जरूरत है ।
हम देखते है की हवा मिठाई बेचने बाले सादे पेकिट मे एक ही रंग की हवा मिठाई बेचते देखे जाते है और  उस मिठाई मे मीठे के अलावा कोई स्वाद व सुगंध भी नही होती है । जवकि आज खाने की सभी वस्तुओं मे सुगंध का उपयोग अनिवार्य है । इसलिए कॉटन कैडी मे भी आम ' नीबू ' संतरा 'आदि की सुगंध का प्रयोग करना चाहिए यह खादय सुगंधियॉ आज सहज  सुलभ है । इसके साथ ही यह कैडी पूरे सातो रंगों मे बनाना चाहिए । इस कैंडी की पेकिंग भी प्रिंट होनी चाहिए ।और कॉटन कैडी के हर पेकिट मे बच्चो की पसंद की कोई सस्ती छोटी चीज डालना चाहिए 'जैसे - फोटो 'स्टीकर 'मनोरंजन बैक नोट ' आदि इन प्रयोगो से बच्चो को कॉटन कैडी की तरफ  आधिक  आकृशित किया जा सकता है ।

गुरुवार, 2 फ़रवरी 2017

रोजगार शिक्षा ' प्रशार मे कमी है !

यह सूचना क्रांति का युग है जहाँ हर तरह की जानकारियॉ सहज सुलभ है । पर  आदमी की पहली जरूरत रोजगार है ।और रोजगार जैसे महत्वपूर्ण विषय की शिक्षा का ही देश मे अभाव है । जिसके कारण देश मे बेरोजगारी की समस्या है ।
समाचार पत्र- समाचार पत्र देश मे पतझड के पत्तों की तरह रोज छपते है । पर  इनमें रोजगार से संवंधित संमंग्री बहुत कम होती है ।  और रोजगार विषय पर आधारित  एक पत्र को छोडकर कोई दूशरा समाजार पत्र नही छपता है ।
पत्रिकाए- प्रिंट मीडिया मे लगभग सभी विषयो पर पत्रिकाए है । लेकिन  उधोग धंधे पर कोई पत्रिका नजर नही आती ।
रेडियो - रेडियो स्टेशनो पर भी रोजगारो से संवंधित कार्यक्रम नाम के लिए ही प्रशारित होते है ।रेडियो पर भी रोजगार विषय पर  आधारित  अलग से कोई स्टेशन नही है ।
टीवी -प्रशार भारती की टीवी सेवा के सो से भी अधिक टीवी चेनल है जो देश के कोने कोने तक पहुचकर  अपना प्रशारण देते है। पर रोजगार विषय का कोई भी टीवी चेनल नही है ।
इंटरनेट -इटरनेट पर तो हर विषय की जानकारियो का खजाना है । लेकिन हर  आदमी की पहुँच इंटरनेट तक नही है ।
फिल्म - फिल्में मनोरंजंन के साथ ही शिक्षा काभी  एक  अच्छा माध्यम होती है । पर फिल्मों से भी काले धंधो की ही शिक्षा जादा मिलती है जिससे युवा काले धंधो की तरफ  अकृशित होते है ।
स्कूल - स्कूलो मे भी रोजगार  उनमुखी शिक्षा नही दी जाती । प्रथमिक शिक्षा के पाठयक्रम मे रोजगार की शिक्षा से संवंधित कोई भी पाठ या अध्यक्ष शामिल नही है ।जवकी रोजगार का एक विषय अलग से होने की जरूरत है ।
सरकार- भारत सरकार की कुछ योजनाए है जिनके तहत रोजगार संवंधी प्रशिक्षण देने की व्यावस्था है । पर यह योजनाए भी जमीनी स्तर पर खरी नही उतरती और गांव के लोगो तक  इनका लाभ नही पहुंच पाता और लोग  इससे वंचित रहते है । उधोग धंधे के लिए सरकार की तरफ से लोन की व्यवस्था है ।पर  इसका परिणाम यह होता है की लोग सरकारी रिण लेकर  उधोग स्थापित करते है और फूल है जाते है । इसलिए धंधे के लिए रूपए से जादा जरूरी होती है शिक्षा  उस काम का सही ज्ञान उसकी पूरी जानकारी । तभी उधोग धंधा सफल होता है ।
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रबर बलून विजनस 500₹ से शुरू ।

गु व्वा रे 🎈💃 रबर बलून से तो सभी परिचित है जिनहे फुग्गा और गुब्बारा भी कहा जाता है । हम सभी ने अपने बचपन मे जरूर गुब्बारे खेले होगे ।गुब...